Taranga Ji

तारंगा तीर्थ के बारे में

तारंगाजी सिद्धक्षेत्र परिचय

प्राचीन भारतीय इतिहास इसका साक्षी है कि भारत में जैन धर्म का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। वर्तमान में देखी जाने वाली दुनियां में भारत को एक अहिंसक राष्ट्र की तरह जाना जाता है। महानजोड़ो हड़प्पा की खोज से यह ही निष्कर्ष आता है कि भारतीय के धार्मिक संस्कार रहे हैं। गुजरात भारत का एक महत्वपूर्ण प्रान्त है जो कि अहिंसा और भौतिक प्रगति का सशक्त परिचय देता है। गुजरात में दिगम्बर जैन समाज के सिद्ध क्षेत्र-गिरनारजी, तारंगाजी (तारकवासी) व पावागढ़ हैं, जहाँ से क्रमशः भगवान नेमिनाथ, वस्तु केवली आदि साधु 3 करोड़ मुनि व तीन पाण्डव मोक्ष गये। हमें ज्ञात है कि द्वारका नगरी कृष्ण द्वारा शासित रही और कृष्ण व भगवान नेमिनाथ चचेरे भाई थे। यह अनुमान लगाया जाता है कि भगवान नेमिनाथ की यह तपस्या स्थली रही होगी और हो सकता है कि यहाँ उनका समवसरण भी आया होगा।

गुजरात के जैन समाज की ओर दृष्टिपात करें तो ऐसा आभास होता है कि उस क्षेत्र के आसपास के गाँवों में जैन समाज का प्रभाव रहा होगा। यह अनुमान किया जाता है कि नेमिनाथ भगवान का समवसरण आज से छः हजार वर्ष पूर्व का रहा होगा। पुराण से जानकारी होती है कि भगवान नेमिनाथ के समवसरण में ग्यारह गणधर थे, उनमें वस्त्र केवली प्रमुख गणधर थे। वंश चरित्र से भी यह जानकारी प्राप्त होती है कि यह तारंगा सिद्धक्षेत्र नेमिनाथ भगवान के काल में मुनियों की प्रमुख तपस्या स्थली रही होगी।

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Divine darshan experience at Taranga Tirth Gujarat

इससे हम यह कह सकते हैं कि भगवान नेमिनाथ के काल से यह प्रमुख सिद्धक्षेत्र व तपस्या स्थली रही होगी, क्योंकि यह क्षेत्र सिर्फ जैन समाज का ही आधिपत्य रखता है। हम यह भी कहना चाहेंगे कि उस काल में यहाँ पर तपस्या योग्य वातावरण रहा होगा और यहाँ समृद्ध जैन समाज सहयोगी रहा होगा।

यहाँ के प्रमुख धार्मिक बन्धुओं से चर्चा करते हुए यह जानकारी प्राप्त हुई कि तारंगा सिद्धक्षेत्र करीब 100 वर्ष पहले सेठ हुकमचंदजी (जो एक समय के टेक्सटाइल सम्राट माने जाते थे) द्वारा संचालित था। जब उनके वंशज ने अहमदाबाद से इन्दौर पलायन किया था तब इस क्षेत्र का संचालन यहाँ के दिगम्बर समाज (अर्थात सतरह जिला समाज, बैतालीस समाज, इन्दर समाज व कलाल समाज) को सौंप दिया। तब से यह क्षेत्र आज इस क्षेत्र के निकटवर्ती गाँवों से महानगरों की ओर पलायन हो जाने के बहुत कम दिगम्बर जैन समाज रह गई है। अतः यह विचारणीय है कि इस क्षेत्र के समुचित विकास के लिये जैन परिवारों का निवास आवश्यक है।

तारंगाजी सिद्धक्षेत्र मेहसाणा जिला गुजरात प्रान्त के अन्तर्गत आता है। यह क्षेत्र अरावली पर्वत मालाओं के मध्य अन्तर्गत मनोहारी स्थल है। इन पर्वतों की चट्टानों का स्वरूप अन्य पर्वतों से भिन्न है। इनके अवलोकन से ऐसा लगता है कि यहाँ पूर्व में अत्यधिक वर्षा होती होगी, जिससे चट्टानें गोल-गोल हो गई हैं। अनेक चट्टानों के मध्य ऐसे गुफानुमा स्थान बने हुए हैं, जिन्हें देखकर ऐसा लगता है कि तपस्वियों ने इनमें घोर तपस्या की होगी। इस प्रकार पर्वत पर जाते-जाते अनेक गुफाएँ मिलती हैं, जहाँ पर एक साथ बैठकर 500-1000 मुनियों ने घोर तपस्या की होगी। आहार चर्या के लिये उनमें कुछ साधु यहाँ के आस-पास के गाँवों के लिये निकलते होंगे।

वर्तमान में इस क्षेत्र के अन्तर्गत दो पर्वत हैं, जो सिद्धशिला व कोटी शिला के नाम से प्रसिद्ध हैं। इन पर प्राचीन नेमिनाथ व मल्लिनाथ भगवान के जिनालय हैं। पर्वत वंदना के लिये जाते समय रास्ते में अनेक गुफाएँ दिखाई देती हैं, जहाँ पर ध्यान लगाने के आसन बने हुए हैं। वे सभी गुफाएँ प्राकृतिक और अति प्राचीन हैं। इस तरह की गुफाएँ इन दो पर्वतों पर अनेक स्थलों पर हैं। इसके अलावा अन्य पर्वतों पर भी गुफाएँ होंगी, ऐसा अनुमान है। इसकी खोज करने की आवश्यकता है, क्योंकि यह हमारी साधु परम्परा की धरोहर होगी।

इस सबसे यह अनुमान सुमचित लगता है कि यह क्षेत्र तपस्या के लिये प्रमुख स्थल होगा और वातावरण भी अनुकूल रहा होगा। इसकी समुचित सुरक्षा आवश्यक है।

तारंगाजी सिद्धक्षेत्र पर पहुँचते ही ठहरने व भोजन की समुचित व्यवस्था है। व्रती व सद्गृहस्थ यहाँ रहकर अपने व्रतों की साधना करते हैं। क्षेत्र के बीचों-बीच तारंगाजी के मूलनायक श्री 1008 सम्भवनाथ भगवान की दो हजार वर्ष प्राचीन प्रतिमा है, जो भक्तजनों के लिये अति मनोहारी है। दूसरे मंदिर में पंचधातु निर्मित श्री 1008 भगवान आदिनाथ की प्रतिमा है, जहाँ पर यात्रिजन मनमुग्ध होकर पूजा-अर्चना करते हैं।

क्षेत्र के प्रांगण में भगवान आदिनाथ की प्रतिमा पद्मासन मुद्रा में दस फुट ऊँची ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित कृत्रिम कैलाश पर्वत पर विराजमान है। भगवान बाहुबली की पन्द्रह फुट ऊँची प्रतिमा खड्गासन मुद्रा में विराजमान है। इन दोनों प्रतिमाओं का विशेष अवसरों पर मस्तकाभिषेक होता है। इसके अलावा परिसर में अन्य बड़े मंदिर हैं, जो दर्शनीय हैं। नंदीश्वर मंदिर व मानस स्तम्भ अनुपम स्वरूप से क्षेत्र की धरोहर हैं।

तारंगाजी सिद्धक्षेत्र के तीर्थनायक भगवान सम्भवनाथ का जन्म कल्याणक कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को बहुत हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस दिन क्षेत्र के निकटवर्ती नगरों से व इस क्षेत्र से पूर्व से जुड़े वे सभी भक्त जीव यहाँ उपस्थित होते हैं और धार्मिक क्रियाओं में रुचिपूर्वक भाग लेते हैं।